मुस्लिम औरतों की इल्मी ख़िदमतें
मुहम्मद फ़ारुक़ ख़ाँ
विषय
भूमिका कुरआन
हदीस का इल्म फ़िक्रूह
दर्सगाहें
अुस्लिम औरतों की इल्मी ख़िदमतें
“बिसमिल्लाहिर्हमानिर्रहीम! “अल्लाह के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत . रहमवाला है।”
भूमिका
इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि दीन (इस्लाम) का इल्म सीखने और उसकी ख़िदमत में मुस्लिम औरतों का अहम हिस्सा रहा है। यहाँ तक कि लड़ाई के मैदान में ज़ख््मियों को पानी पिलाने का काम भी उन्होंने किया है। दीन के इल्म के प्रचार-प्रसार के अलावा तिब्ब (चिकित्साशास्त्र), ख़त्ताती (सुलेखन कला) और अदब (साहित्य) कौरा में भी उनकी दिलचस्पी रही है। तक़वा (ईश-भय), परहेज़गारी और ख़ुदा की पहचान के सिलसिले में भी कितनी ही औरतें अपने काम में बेमिसाल रही हैं।
इंस किताब में दीन के इल्म की ख़िदमत के सिलसिले में औरतों का जो हिस्सा रहा है उसका एक संक्षिप्त जाइज़ा लिया गया है। आज भी जामिअतुस्सालिहात और औरतों की दूसरी यूनिवर्सिटियों और कॉलेजों से उम्मत की कितनी ही बेटियाँ आलमियत से फ़राग़त: और सनदें हासिल कर रही हैं। दीन के इल्म में फ़ज़ीलत (मास्टर डिग्री) हासिल करने का .जज़्वा और हौसला उनमें उभर रहा है।
इस छोटी-सी किताब को तरतीब देने का असल मक़सद औरतों
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का हौसला बढ़ाना है कि वे चाहें तो दीन के इल्म की बेहतरीन ख़िदमंत अंजाम दे सकती हैं। औरतों के हलक़े और दायरे में इस्लाम की दावत का काम बड़े असरदार अंदाज़ में बहुत आसानी के साथ औरतें ही कर सकती हैं। दीन के इल्म और ज्ञान से सुसज्जित औरतें इस्लाम की दावत के मैदान में अपने शौहरों की मददगार और सहयोगी साबित हो सकती हैं।
ख़ाकसार मुहम्मद फ़ारुक़ खरा
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कुरआन
अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल-) के ज़माने से ही औरतों को क्रुरआन मजीद से विशेष रूप से दिलचस्पी और लगाव रहा है। वे कुरआन को हिफ़्ज़ (कंठस्थ) करतीं और क्गुरआन लिखकर भी अपने पास रखती थीं।
क्षुरआन मजीद से ख़ास ताल्लुक़ रखनेवाली औरतों में हज़रत हफ़्सा-बिन्ते-सीरीन, हज़रत बैरम-बिन्ते-अहमद मालिकिय्या, हज़रत ख़दीजा-बिन्ते-अह्मद फ़ासिय्या, हज़रत उम्मुल-ख़ैर-बिन्ते-अहमद- बिन-ईसा, हज़रत सलमा उम्मुल-सख़ैर-बिन्ते-मुहक़िक्रिक्र-बिन-अल-जज़री, हज़रत आइशा-बिन्ते-इबराहीम उम्मे-मुहम्मद दिमशक्रिय्या, हज़रत आइशा-बिन्ते-इमरान मुतवल्ली और ऐसी ही दूसरी कितनी ही औरतों को शोहरत हासिल है। ..
इल्मे-तफ़सीर (कुरआन मजीद की व्याख्या) के मैदान में औरतों का ज़िक्र और तज़किरा कम मिलता है। गुज़रे हुए क़रीब के ज़माने की किताबों में एक बग़दादी ने अपनी किताब में दो औरतों का ज़िक्र किया है, जिन्होंने तफ़सीर के मैदान में कुछ काम किए हैं। आदिल और इसमाईल बग़दादी ने अपनी किताब में क्रुरुआन मजीद की एक व्याख्याकार (मुफ़स्सिरा) औरत का ज़िक्र किया है। ,
आज के मौजूदा ज़माने में औरतों की एक बड़ी तादाद ने कुरआन मजीद के इल्म और ज्ञान में डॉक्ट्रेट के लिए लेख लिखे हैं।
मुस्लिम औरतों की इल्मी ख़िदम्तें का,
नई सदी में तीन मुफ़स्सिरा औरतों का सविस्तार परिचय डॉक्टर अफ़ाफ़ अबछुलनाफ़ूर हमीद ने किया है। जिनमें आइशा अब्दुर्रहमान-बिन्ते-शाती ने ऊँचा मक़ाम और दर्जा हासिल किया है। इन्होंने इस्लामी उलूम (इल्मों) की तरफ़ ख़ास ध्यान दिया है। इनकी मशहूर किताब 'अत्तफ़्सीरुल-बयानिय्यु लिल-क्ुरआनिल-करीमि' और 'अल-क्ुरआन व क़ज़ायल-इनसान' पर इन्हें फ़ैसल एवार्ड से नवाज़ा गया।
अत्तफसीरुल-बयानी अगरचे पूंरे कुरआन मजीद की तफ़सीर (व्याख्या) नहीं है फिर भी कई पहलुओं से इस तफ़सीर को विशेषता प्राप्त है। यह किताब दो हिस्सों में है। मध्यम और छोटी सूरतों की तफ़सीर की गई है। बिन्ते-शाती कुरआन को हर पहलू से ख़ुद कुरआन से समझने पर ज़ोर देती हैं।
फिर उनके नज़दीक क्कुरआन का अध्ययन रिवायती तरीक़े से नहीं बल्कि विषय आधारित अन्दाज़ और तर्ज़ पर करना चाहिए।. उनका कहना है कि कुरआन मजीद के एक शब्द की जगह कोई
दूसरा शब्द नहीं ले सकता । यह बहुत ही ख़ास बात है।
... ज़ैनब ग़ज़ाली (रह.) ने भी कई अहम किताबें लिखी हैं। अपनी तफ़सीर (व्याख्या) में उन्होंने लुगवी (शब्दकोशीय) मसले और फ़िक्रूही व मस्लकी मतभेदों से परहेज़ किया है। उन्होंने ख़ास तौर से दावती पहलू पर ध्यान दिया है।
हन्नान लिहाम शाम (सीरिया) की एक प्रतिष्ठित औरत हैं।
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क्ुरआनी विषयों पर उनकी कई किताबें हैं। वे तफ़सीर के सिलसिले में सहाबा (रज़ि.) के कथनों पर भरोसा करती हैं। तफ़सीर में अदबी रंग नुमायाँ है। तफ़सीर का तर्ज़ विषय पर रखा गया है। वे हर सूरा को विषय के लिहाज़ से कई भागों में बाँटती हैं, फिर उनकी व्याख्या * करती हैं। तफ़सीर में सामाजिक मसलों का हल भी पेश करती हैं। औरतों के मामलों की तरफ़ ख़ासकर ध्यान दिया है। मतभेदवाल्े मसलों से बचने का अन्दाज़ अपनाया है। तफ़सीर में मौजूदा मसलों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं करतीं।
नए ज़माने की इन तफ़सीर करनेवाली औरतों के हालात और उनके काम के सिलसिले में त्रैमासिक पत्रिका तहक़ीक़ाते-इस्लामी (उर्दू) अलीगढ़, यू.पी., अंक जुलाई-सितम्बर 204 ई. देखें।
हदीस का इल्म
इतिहास के हर दौर में ऐसी औरतें रही हैं जिनसे हदीस के इल्म को बढ़ोत्तरी हासिल हुई और मदों तक ने उनसे इल्म हासिल किया। तफ़सीर अस्माउर्रिजाल की आख़िरी जिल्दों में ऐसी औरतों का ज़िक्र किया गया है।
प्यारे नबी (सल्ल-) के मुबारक ज़माने में औरतों ने हदीस को फैलाने में हिस्सा लिया। आप (सल्ल.-) की वफ़ात के बाद कितनी ही सहाबी औरतें (रज़ि-) हैं, जिनमें आप (सल्ल-) की पाक बीवियाँ
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भी शामिल हैं, कि हदीस की चाहत रखनेवालों ने उनसे फ़ायदा उठाया। उनमें हज़रत हफ़्सा (रज़ि.), हज़रत उम्मे-हबीबा (रज़ि,), हज़रत उम्मे-सलमा (रज़ि-), हज़रत मैमूना (रज़ि.) और हज़रत आइशा (रज़ि.) के नामों से इल््म रखनेवाले बहुत अच्छी: तरह वाक़िफ़ हैं। ख़ास तौर से हज़रत आइशा (रज़ि-) हदीस में सबसे ज्यादा अहमियत रखती हैं। वे हदीस की व्याख्या भी करती थीं। सबसे ज़्यादा हदीस बयान करनेवालों में हज़रत आइशा (रज़ि.) का शुमार होता है, उनकी बयान की हुई हदीसों की तादाद 220 है। हज़रत उम्मे-सलमा (रज़ि.) की बयान की हुई हदीसों की तादाद 578 है | फ़ातिमा-बिन्ते-यमान बड़े ऊँचे दर्जे की हदीस की आलिमा थीं। हज़रत आबिदा अल-मदनिय्या, अब्दा-बिन्ते-बिशर, उम्मर-सक्रफ़िय्या और हज़रत ज़ैनब ने हदीस पढ़ाने और सिखाने का एहतिमाम (प्रबन्ध) किया। हज़रत आबिदा हदीस के आलिम इब्ने-यज़ीद की बाँदी थीं, इन्होंने मदीना के आलिमों से बहुत ही ज़्यादा हदीसें बयान की हैं। हज़रत आबिदा ने दस हज़ार हदीसें मदीना के आलिमों से बयान की हैं। हज़रत ज़ैनब-बिन्ते-सुलैमान हदीस की आलिमा थीं, उनके शागिदों (शिष्यों) में बेशुमार औरतें और मर्द शामिल थे। मर्द परदे की ओट से हदीस का इल्म सीखा करते थे। |
सहाबा (रज़ि.) और ताबिईन के ज़माने में भी औरतों, ने हदीस की ख़िदमत में हिस्सा लिया, हफ़्सा-बिन्ते-इब्ने-सीरीन, उम्मे-दरदा
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सुग़रा, अमरा-बिन्ते-अब्दुरहमान उस ज़माने की जानी-मानी हदीस की आतिमा थीं । उम्मे-दरदा को इयास-बिन-मुआविया इल्मो-फ़ज़्ल और हदीस के इल्म में सबसे ऊँचा मक़ाम देते थे, अमरा- बिन्ते-अब्दुररहमान को हज़रत आइशा (रज़ि.) की बयान की हुई हदीसों पर सनद का दर्जा हासित्र था। |
उस ज़माने की कुछ दूसरी औरतें भी हदीस सिखाने और पढ़ाने में मशहूर रही हैं। अब्दा-बिन्ते-बिशर आबिदा का नाम पहले आ चुका है। उम्मे-उमर अस्सक्रफ़िय्या, ज़ैनब, नफ़ीसा-बिन्ते-हसन-बिन- ज़ियाद, ख़दीजा उम्मे-मुहम्मद अब्दह बिन्ते-अब्दुरहमान इन सभी को हदीस पर पूरी महारत हासिल थी।
हदीसों के सभी मशहूर संग्रहों में ऐसी औरतों के नाम मिलते हैं जिनसे संग्रह करनेवालों मे सीधे-सीधे उन्हीं से हदीसें बयान की हैं। । चौथी सदी हिजरी में हदीस में जिन औरतों ने शोहरत (प्रसिद्धि) हासिल की है उनमें फ़ातिमा-बिन्ते-अब्ुर्रहमान, फ़ातिमा, अमतुल-वहीदा उम्मुल-फ़तूह, अमतुस्सलाम और जुमआ-बिन्ते-अहमद ख़ास हैं।
पाँचवी सदी हिजरी में अनेकों औरतों ने हदीस में शोहरत हासिल की। मिसाल के तौर पर फ़ातिमा-बिन्ते-हसन, करीमतुल- मरजिय्या और तरीन-बिन्ते-अहमद सहीह बुख़ारी पर सनद की हैसियत रखती थीं। ख़तीब बग़दादी और अन्दलुस के हदीस के आलिम अल-हुमैदी ने इन्हीं से सहीह बुख़ारी पढ़ी थी।
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फ़ातिमा-बिन्ते-मुहम्मद, शुहदा-बिन्ते-अहमद और सत्तुल-वुज़रा छठी सदी हिजरी की मशहूर हदीस की आलिमा थीं। सत्तुल-वुज़रा और कुछ दूसरी औरतें बुख़ारी के अलावा हदीस की दूसरी किताबें भी पढ़ाती थीं। इसी लिए उम्मुल-ख़ैर फ़ातिमा-बिन्ते-अली और फ़ातिमा शीराज़िय्या सहीह मुस्लिम का दर्स देती थीं। फ़ातिमा जूंज़दानिया और अनीसा ने तबरानी के तीनों संग्रहों को अपने हलक़े में सुनाया। ज़ैनब मुसनद अहमद-बिन-हम्बल का दर्स देती थीं। ज़ैनब-बिन्ते-अहमद-बिन-उमर ने मुसनद दारमी और मुसनद अब्द-बिन-हुमैद की अपने छात्रों के सामने रिवायत (हदीस बयान) की। ज़ैनब-बिन्ते-अहमद पूरी मुसनद अबी-हनीफ़ा, शमाइले-तिरमिज़ी और इमाम तहावी की शरह मआनियुल-आसार का दर्स देती थीं। इब्ने-असाकिर जो दिमश्क़ के इतिहास के मशहूर लेखक हैं मर्दों के अलावा आठ सौ (800) औरतों से हदीस का दर्स लिया । नवीं सदी के मशहूर हदीस के आलिम अफ़ीफ़ुद्दीन जुनैद ने सुनन दारमी फ़ातिमा-बिन्ते-अहमद-बिन-क़ासिम से पढ़ी थी। ज़ैनब-बिन्ते-शअरी . से हदीस का इल्म हासिल करनेवालों में मशहूर लेखक इब्ने-खलकान भी शामिल हैं। आठवीं और नौंवी सदी हिजरी में हंदीस में समझ-बूझ और महारत रखनेवाल्ी औरतों की अधिकता रही है | इब्ने-हजर अस्क्रलानी ने अपनी किताब अद्दुररुल-कामिना में आठवीं सदी हिजरी की एक
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सौ सत्तर (770) ख़ास हस्तियों के हालात लिखे हैं। जिनमें अधिकतर को हदीस के इल्म में दखल हासिल था। इब्ने-हजर अस्क़लानी को उनमें से अनेकों औरतों से शिक्षिका और शिक्षार्थी का सम्बन्ध हासिल रहा है। शोबुल-अरब मशहूर हदीस की आलिमा थीं, हदीस के आलिम अल-इराक़ी की शिक्षिका रही हैं। नवीं सदी हिजरी की हदीस की आलिमा औरतों के हालात मुहम्मद-बिन- अब्ुर्रहमान संख़ावी ने लिखे हैं। उमर-बिन-फ़हद ने भी मुअजमुश्शुयूख् में उस ज़माने की एक सौ तीस (90) से अधिक हदीस की आलिमा औरतों का ज़िक्र किया है। दसवीं सदी हिजरी से हदीस से औरतों की दिलचस्पी कम हो गई, लेकिन यह ख़याल सही नहीं है कि हदीस से दिलचस्पी लेनी उन्होंने बिलकुल छोड़ दी थी।
फ़िक््ह
फ़िक्कूह अस्त में इस्लामी शरीअत (नियमों) के अमली हुक्मों को दलीलों और विस्तार से जानने का नाम है। पहले के ज़माने. में औरतों को दीनी' तालीम (शिक्षा) हासिल करने का बहुत ही ज़ौक-शौक़ रहा है | उम्मे-बिश्र अनसारिया (रज़ि.) को दीन के इल्म और फ़िक्रह में बड़ा मक़ाम हासिल था। हज़ंरत हफ़्सा (रज़ि.) को उम्मे-बिश्ञ अनसारिया से गहरा ताल्लुक़ था। इसी तरह उन्हें हदीस और फ़िक्ूह सम्बन्धी इल्मों को जानने का अच्छा ख़ासा अवसर _
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प्राप्त हुआ | वे फ़िक़ूह के इल्म की आलिमा बन गईं। '
हज़रत उम्मे-दरदा ख़ैरा (रज़ि.) हज़रत अबू-दरदा (रज़ि-) की बीवी थीं। दीन के मामलों में, दीन के फ़िक्रही मामलों में और सही-पक्की राय देने के सिलसिले में बेहतरीन विशेषताओं और खूबियों की मालिक थीं। इमाम इन्में-क्रस्यिम (रह-) ने बाईस (22) ऐसी सहाबी औरतों का ज़िक्र किया है जो फ़िक्रह और फ़तवा देने में मशहूर थीं।
हज़रत फ़ातिमा-बिन्ते-अलाउद्दीन हनफ़ी बड़े ऊँचे दर्जे की फ़िक़र्ह की आलिमा मानी जाती थीं। अमतुल-वाहिद-बिन्ते-क्वाज़ी हुसैन ने फ़िक्कृह को ज़बानी याद किया। शाफ़िई-फ़िक्रह में उन्हें कमाल हासिल था।
हज़रत उम्मे-ईसा-बिन्ते-इबराहीम बग़दादिय्या भी अपने वक़्त की जानी-मानी मशहूर फ़िक़्ह की आलिमा थीं।
हज़रत अमतुर्रहमान-बिन्ते-शेख तक़ीयुद्दीन भी बड़े ऊँचे दर्जे की फ़िक्र्ह की आलिमा थीं। उन्हें 'सत्तुल-फ़ुकहा' के लक्कब (उपाधि) से नवाज़ा गया था।
इनके अलावा और कितनी ही फ़िक़्ह का इल्म रखनेवाली औरतें हैं जिन्होंने इस सिलसिले में नुमायाँ काम अंजाम दिए हैं।
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दर्सगाहें
इल्मे सिखाने का रिवाज और आगाज़ हज़रत आइशा (रज़ि.) से शुरू हुआ, फिर यह सिलसिला बड़े पैमाने पर चला। चौथी सदी हिजरी तक औरतों ने अपने घर को ही शिक्षा (तालीम) का केन्द्र बनाए रखा, जिनसे औरतों के अलावा आलिम, फ़िक्र्ह के आलिम और बुजुर्ग लोग भी फ़ायदा उठाते थे। बाद में मदरसे बनने लगे। लड़कियों के मदरसों को क़्ायम करने का अमली काम किया गया। - औरतें शिक्षकों के अलावा वक़्त के बड़े-बड़े मदरसों में रहकर भी हदीस का इल्म हासिल करती थीं।
औरतों का सबसे पहला मदरसा पश्चिमी अक़्सा में फ़ाश में 245 हिजरी में क़रायम हुआ जो आज भी जामिअतुल-क्करविय्यीन के नाम से मौजूद है। इसको उम्मुल-बनीन फ़ातिमा-बिन्ते-मुहम्मद-बिन- अब्दुल्लाह फ़हरिय्या (रह.) ने बनवाया था, उनकी बहन मरयम ने उसी साल 245 हिजरी में एक मस्जिद बनवाई जिसको बाद में. जामिउल-अन्दलुस के नांम से शोहरत मिली | इसमें सदियों तक बहुत-से इल्म और फ़न्न की तालीम दी जाती रही।
तहक़ीक़ से पता चला है कि उमर मस्जिद दिमश्क़ की यूनिवर्सिटी में 500 छात्राएँ हास्टल में रहकर तालीम हासिल करती रहीं। नुऐमा-बिन्ते-अली और उम्मे-अहमद ज़ैनब-बिन्ते-अल-मक्की और दूसरी औरतों ने बड़े मदरसों मिसाल के तौर पर मदरसा
न 3233 मनन ल कक जम किक न जज अर युत्निम औरतों की इत्मी ख़िदमतें 65 .
अज़ीज़िय्या में रहकर तालीम दी। मरयम अन्दलुसिय्या ने चौथी सदी हिजरी में इशबीलिय्या में एक दर्सगाह क्रायम की, जिसमें, दूर-दूर से आकर औरतें इल्म और अदब-की तालीम हासिल करती थीं। - फ़ख़रुन्निसा मशहिदा (छठी सदी हिजरी) जो इल्मो-फ़ज्ल में मशहूर थीं, ख़लीफ़ा की तरफ़ से उन्हें एक बड़ी जागीर (इनाम में प्राप्त ज़मीन) मिली थी । उसकी आमदनी से दजला नदी के किनारे एक शानदार दर्सगाह बनवाई। सैकड़ों छात्र तालीम हासिल करते, जिनके सारे ख़र्चे उन्होंने अपने जिम्मे ले रखे थे। अन्दलुस की आलिमा-फ़ाज़िला फ़ातिमा ग़ालीमा-बिन्ते-मुहम्मद ने भी अपना बड़ा मदरसा क़ायम किया जिसमें औरतों ,को तालीम दी जाती थी। ज़ैनब-बिन्ते-अब्दुर्रहमान (65 हिजरी) इल्मो-फ़ज़्ल में जानी-मानी थीं। अब्बासी ख़लीफ़ा ने उन्हें इजाज़त दी कि वे अब्बासी सल्तनत (राज्य) में जहाँ चाहें दर्सगाह क़ायम करें और फ़िक्कूह (शरीअत) का दर्स दें। सुलतान सलाहुदु्दीन की बहन एक आलिमा-फ़ाज़िला औरत थीं, उन्होंने दिमश्क़ के मक़ाम क़ासयून पहाड़ी में एक शानदार बड़ी दर्सगाह बनवाई, जिसे मदरसा ख़ातूनिय्या के नाम से शोहरंत हासिल हुई। उन्होंने ख़चों के लिए एक बड़ी जायदाद वक़्फ़ की थी।
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